कारगिल में गुंजा जान दे देंगे पर देश की माटी नहीं

  • द्रास युद्ध स्मारक पर उपराज्यपाल माथुर और सीडीएस जनरल विपिन रावत ने दी श्रद्धांजलि
  • बारिश और धुंध के चलते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समारोह में नहीं हो पाए शामिल

कारगिल में द्रास युद्ध स्मारक पर सोमवार को भारतीय सेना के जवानों ने जब शेर की गर्जना करते हुए प्रण लिया की जान दे देंगे पर देश की माटी नहीं। तो प्रत्येक देश प्रेमी का सिर गर्व से ऊंचा हो गया यह मौका था कारगिल विजय दिवस की 22 वीं वर्षगांठ का यह समारोह इस बार इसलिए भी खास रहा क्योंकि भारतीय सेना 1971 के युद्ध में जीत के 50 साल होने पर वर्ष 2021 को विजय वर्ष के रूप में मना रही है।
कारगिल युद्ध के बलिदानों को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को द्रास पहुंचना था लेकिन बारिश के चलते उनके कार्यक्रम को बदलना पड़ा हालांकि उन्होंने उत्तरी कश्मीर में बारामुला में युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी राष्ट्रपति के नहीं पहुंचने पर ब्रास युद्ध स्मारक पर लद्दाख के उपराज्यपाल आरके माथुर और सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुनिया का सबसे कठिन युद्ध लड़ा था इस लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तान सैनिकों को हराकर चोटियों पर तिरंगा फहराया था अपने इस अभियान को भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय नाम दिया था इस युद्ध में भारतीय सेना के 527 अधिकारी और जवान बलिदान हो गए थे वहीं 1300 से अधिक सैनिक घायल हुए थे इनकी शहीदों की याद में द्रास में तोलोलिंग पहाड़ियों की वोट में स्थित युद्ध स्मारक बनाया है इसमें सभी शहीदों के शिलालेख स्थापित है। कारगिल विजय दिवस पर यही सोमवार को मुख्य कार्यक्रम हुआ। द्रास युद्ध स्मारक पर सोमवार को देशभक्ति की अलौकिक छटा थी फूलों से सजाए गए युद्ध स्मारक पर एक और जब उपराज्यपाल और जनरल बिपिन रावत शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहे थे तो वही देशभक्ति से ओतप्रोत कार्यक्रम उत्साह बढ़ा रहे थे द्रास में सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल वालों के जोशी सेना की 14 15 व 16 कोर के कोर कमांडर ने भी शहीदों को सलामी दी परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार योगेंद्र सिंह यादव के साथ परमवीर चक्र विजेता मनोज पांडे के भाई मनमोहन पांडे समेत कई शहीदों के स्वजन और युद्ध में हिस्सा ले चुके पूर्व सैनिक भी समारोह में शामिल हुए थे

बिहार का एक गांव जो 43 बाढ़ बाढ़ में बहा और फिर से बसा

यह कहानी नरकटिया के ग्रामीणों की ग्रामीणों की जिजीविषा और सब कुछ खोकर फिर से खड़ा होने की है जीवंतता की है बागमती की बाढ़ से गुजर ना उनकी नियति है तो पुरुष भारतीय से फिर गांव को आबाद करना कर्म है बीते 87 साल में 43 बार यह गांव गुजर चुका है इसके बावजूद ग्रामीणों ने हार नहीं मानी इस बार भी यही स्थिति है बेघर हो चुके ग्रामीण बरसात बीत जाने का इंतजार कर रहे हैं उजड़ गया गांव ग्रामीण एक बार फिर आवाद करेंगे।

शिवहर का नरकटिया गांव 87 साल से झेल रहा बाढ़ की विभीषिका तबाही के बाद भी ग्रामीणों का हौसला कम नहीं

गांव में 300 घर, अवादी देढ हजार:-बिहार के शिवहर जिले के पिपराही प्रखंड के बेलवा पंचायत स्थित नरकटिया गांव में 300 घर है आबादी तकरीबन डेढ़ हजार है यह गांव कभी बाढ़ की तबाही से दूर था लेकिन वर्ष 1934 में आए भूकंप के चलते 2 किलोमीटर दूर बहने वाली बागमती की धारा मुड़कर गांव के पास पहुंच गई उस साल बरसात में पहली बार बागमती ने तबाही मचाई इसके बाद से हर साल, दो साल में तबाही नियति बन गई है इसीलिए नहीं बनाता है कोई पक्का का घर गांव के सभी बुजुर्गों 85 वर्षीय ब्रह्मदेव साहनी कहते हैं कि वह अब तक 50 बार बाढ़ का कहर देख चुके हैं 20 बार तो अपना घर बना चुके हैं ग्रामीण सतनारायण साहनी भी कहते हैं की बागमती की तबाही के चलते गांव में कोई पक्का घर नहीं बनाता महज दोस्त पक्के मकान बने हैं बरसात शुरू होने से पहले अधिकतर घरों की महिलाएं बच्चों को लेकर रिश्तेदार के घर चली जाती है बरसात में बीमार को अस्पताल पहुंचाना काफी मुश्किल होता है रामचंद्र मां जी बताते हैं कि पिछले साल बागमती के कटाव में 47 घर बह गए थे सभी कच्चे घर गिर गए थे इस बार 1 जुलाई को बाढ़ में 50 घर बह गए बहुत से घर गिर गए हैं लोग प्लास्टिक टांग कर और मचान बनाकर रह रहे हैं बरसात के बाद सितंबर में ग्रामीण फिर से घर बनाने में जुट जाएंगे।

बदलता रहा गांव का नक्शा: –दवा व्यवसाई मनोज कुमार की आधी से अधिक जमीन समेत घर बागमती की धारा में विलीन हो चुका है वह कहते हैं कि बागमती कब धारा बदल ले और किसके घर को बहाकर ले जाएंगे बता पाना मुश्किल है इसके बाद भी हम हार मानने वाले में नहीं है नदी से कोई शिकवा नहीं है शिकायत व्यवस्था से है इस गांव में एक दशक से कोई अधिकारी नहीं आया बाढ़ के दौरान दूर से अधिकारी जायजा लेकर चले जाते हैं मुखिया कमलेश पासवान का कहना है कि बाढ़ से गुजरने के बाद ग्रामीण दूसरी जगह घर बनाते हैं इस कारण गांव का नक्शा बदलता रहता है इसके चलते हर घर नल का जल सड़क और शौचालय जैसी सुविधाओं का लाभ इस गांव को नहीं मिल सका है बिजली की सुविधा है।

जिला अधिकारी :- नरकटिया को बाढ़ से बचाने के लिए बेलवा घाट पर डैम बन रहा है इसके जरिए बागमती के पानी को रोककर उसकी पुरानी धारा में डिस्चार्ज किया जाएगा निर्माण वर्ष 2020 में ही पूरा करना था लेकिन बाढ़ की वजह से कार्य प्रभावित हुआ इसे जल्द पूरा किया जाएगा

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