राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है

पिछले दिनों एक बड़े मतांतरण रैकेट का पता चला इस्लामिक दवा सेंटर के साए में चल रहे मतांतरण की इस मुहिम मैं लगे इस्लामिक कट्टरपंथियों ने सेकरो की संख्या में मूर्ख बाद हीरो तक का मतांतरण करा डाला मतांतरण मैं लिप्त लोग दवा की उसी इस्लामी संकल्पना पर काम कर रहे थे जिसे आगे बढ़ाने के लिए हाफिज सईद जमात उद दावा चलाता है यह चौक ने वाला रहस्य घाटन और इन गीत करता है कि मतांतरण के अंतरराष्ट्रीय अभियान से जुड़ी संस्थाएं समाज के उन वर्गों का भी गहराई से सर्वेक्षण करती रहती है जिनकी और आम जनमानस और सरकारों का ध्यान कम ही जाता है यह पूरा मामला यह भी दिखाता है कि मतांतरण को अपना मिशन बनाने वाली संस्थाएं मुक बधिर दिव्यांग और अनाथ बच्चों अकेली बीच में जो भी काम करती है वह मानवीयता से प्रेरित होकर नहीं बल्कि अपने मत मजहब के अनुयायियों की संख्या थोक के भाव बढ़ाने के मकसद से करती है इस्लामिक दवा सेंटर को विदेशी फंडिंग मुहैया कराने वाली कई संस्थाएं तथाकथित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है लेकिन मतांतरण से जुड़े प्रश्न यही तक सीमित रहती है।
मतांतरण रैकेट का मास्टरमाइंड कुमार गौतम नामक एक व्यक्ति स्विंग पहले हिंदू धर्म से इस्लाम में मतांतरण हुआ था उसके बाद उसने जो कुछ किया वहां स्वामी विवेकानंद के भारतीय पर्यवेक्षक में मतांतरण पर दिए उस व्यक्तित्व कोही चरितार्थ करता है कि हिंदू धर्म छोड़कर जाने वाला व्यक्ति अपने मूल धर्म के प्रति शत्रुता का भाव रखने लगा है इस शत्रुता भाव ने भारत के इतिहास में मेरी नृशंस नरसिंह हारो से लेकर देश के बंटवारे तक हो घटित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है दक्षिण भारत के मंदिरों का ध्वस्त करने वाले मलिक काफूर से लेकर मजहब के नाम पर देश का विभाजन कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना तक इसके असंख्य उदाहरण है आज भी कश्मीर में बड़े आतंकी कमांडरों में हिंदू उपनाम बताते हैं की उनके पूर्वजों का मतांतरण कुछ पीडीए पहले ही हुआ है पूर्वोत्तर भारत में 10 कोख से सक्रिय एनडी एफबी एनएल एफबी जैसे उग्रवादी संगठनों पूरी तरह इस आए कट्टरपंथी संगठन की है इस प्रदेश का इसाई कारण और इन अगलाववादी आंदोलन का जन्म साथ साथ हुई घटनाएं हैं मध्य भारत के नक्सल प्रभावित भागों में भी ईसाई मिशनरी बेहद सक्रिय हैं ऐसे में मतांतरण की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव को बाला कैसा नकारा जा सकता है विशेषकर भारत जैसे देश में जिसका मजहब के आधार पर विभाजन हुए 7 दशक ही बीते हो आखिर भारत इतने योजनाबद्ध तरीके से कराए जा रहे मत अंतरण को कैसे नजरअंदाज कर सकता है।
आखिर भारत के वही प्रदेश अगला ववादी मुहिम के चलते हिंसा ग्रस्त क्यों है जहां पिछली कुछ सदियों में बड़े पैमाने पर मतांतरण हुआ स्वतंत्रता भारत का इतिहास यह पाठ पढ़ाता है कि देश में दो बार बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हुआ एक बार 1990 में इस्लामी कट्टरपंथ के चलते कश्मीर से हिंदुओं को सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा और दूसरी बार 1997 में रियांग या ब्रो हिंदुओं को मिजोरम से स्थाई कट्टरपंथियों के हमलों के चलते भागना पड़ा दोनों ही मामले में यह पलायन लगभग स्थाई ही बन गया और यह लोग कभी वापस नहीं लौट पाए मतलब भारत के बहुसंख्यक समाज को उन प्रदेशों से पलायन करना पड़ा जहां पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर मतांतरण फिर चलते वे अल्पसंख्यक हो गए थे।
भारत विश्व का अकेला देश है जहां अल्पसंख्यक मतों के लोग मतांतरण अभियान चलाने का सर्वधानीक अधिकार बनाए रखना चाहता है और बहुसंख्यक मतांतरण पर रोक लगाना चाहते हैं अन्यथा स्वभाविक प्रक्रिया यह होती है कि अपने अनुयायियों को बहु संख्या को द्वारा मतांतरण कराए जाने से बचाने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय मतांतरण पर पर प्रतिबंध की मांग किया करते हैं जो स्वाभाविक भी है यह सम्मानित समाज की बात है कि विदेश के मतांतरण कराने के लिए और वह रुपयों यूं ही कोई क्यों भेजेगा दरअसल मतांतरण ईसाई और इस्लामिक देशों द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों का हिस्सा है और अक्सर भू राजनीतिक बिसात पर इसका उपयोग किया जाता है उदाहरण के लिए नेपाल में पैर पसारने मूवाड और उस के माध्यम से बढ़ती चीन प्रभाव को कम करने के लिए पश्चिमी देश की खुफिया एजेंसी ईसाई मिशनरियों का उपयोग करती आई है जिसका असर नेपाल में बढ़ते मतांतरण और घटते भारतीय प्रभाव के रूप में दिखाया जाता है।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बढ़ती ताकत को काबू करने के लिए पश्चिमी देश खुद चीन के भीतर ईसाई मिशनरी गतिविधियों को प्रोत्साहन देते हो आए हैं कुछ वर्ष पहले अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने सार्वजनिक रूप से इस पर प्रसन्नता जताई थी कि तेरा करो और चीनी ईसाई बन चुके हैं अमेरिकी राष्ट्रपति कि इस व्यवहार की तुलना नेपाल के हिंदू राष्ट्र नौ रह जाने को लेकर भारतीय उदासीनता से देखती ही बनती है बाहर हाल यह संख्या 13 करोड़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की संख्या से चार करोड़ ज्यादा है और आने वाले कुछ दशकों में चीन विश्व की सबसे बड़ी साई आबादी का घर बन सकता है इसके चिंतित चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कंफ्यूज के उन अध्यात्मिक विचारों पर आधारित प्राचीन चीनी संस्कृति को पुणजीवित करने पर करोड़ों डॉलर खर्च करने में लगी हुई है जिन्हें ध्वस्त करने के लिए एक समय मां होने संस्कृतिक क्रांति जैसा खूनी अभियान चलाया था।
अमेरिका के जाने-माने सामरिक चिंतक रावर्ट का प्लान लिख चुके हैं कि किसी तरह अमेरिकी है खुफिया एजेंसी है अमेरिकी फौज से सेना वृत्त हुए लोग को ईसाई मिशनरी बनाकर इनका उपयोग म्यांमार जैसे देशों में आदिवासियों का मतांतरण कराने और उन्हें सशस्त्र संघर्ष में सहायता करने के लिए करती आई है अपने चारों ओर मतांतरण के जरिए चल रहे इस भूरा राजनीतिक खेल कि हम अनदेखी नहीं कर सकते मतांतरण मैं लिप्त जीन शक्तियों से हमारा मुकाबला है उनके लिए मजहब ना तो राजनीतिक से अलग है और ना ही भू राजनीति से दूसरे देश में मतांतरण कराना इन शक्तियों की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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